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» Historical Background
Though there is no authentic history of Sheikhpura scripted in any book or records but according to knowledge collected from various sources history of Sheikhpura dates back to the age of Mahabharata. It is believed that in the Mahabharata age a demon girl Hidimba lived on the hillocks situated on its Eastern stretch with whom one Pandava brother Bhima married and gave birth to a heroic son ‘Ghatotkach’. Later on this hill was called ‘Girihinda’ after the name of Hindimba or Hidimba. Girihinda village is still situated over there. According to one belief about six hundred years ago a great suphie saint ‘Hazarat Makhdum Shah Shoeb Rahamatullah Aleh’ had founded the city of Sheikhpura. He settled over here and the dense forests were cleaned and people started settling over here. Later on it became densely populated. During the Pallava reign also Sheikhpura was one of the chief administrative centres. It is believed that the famous Afghan ruler Sher Shah Suri had got the famous ‘Dal Kuan’ constructed over here. Till now ‘Dal Kuan’ and Sheikhpura is believed to be synonymous with each other. During the mughal period, Sheikhpura got the status of Thana. In the British period Sheikhpura was accorded the status of Big Kotwali and after independence it was given the status of Block. On 14th April 1983 Sheikhpura became a Subdivision and on 31st July 1994 it was upgraded to District status.
From Pages 245-247
Sheikhpura ---
A village in the extreme south-west of the
Monghyr subdivision wiith a station situated on
the
South Bihar
Railway. Population (1901) 10,135. I is an
important centre for the grain trade and for the
manufacture of hookah tubes, and contains a
District Board bungalow,police station,and
dispensary. Sheikhpura has been identified by
General Cunninghum with a village visited by the
Chinese pilgrim Hieun Tsiang in the seventh
century A.D. Hieun Tsiang after leaving the Gaya
district arrived at a large and populous village
to the south of the Ganges, which possessed many
Brahmanical temples ornamented with fine
sculptures. There was also a great stupa built
on the spot where Buddha had preached for one
night. " Both distance and direction point to
the vicinity of Sheikhpura, a position which is
confirmed by the subsequent easterly route of
the pilgrim,through forests and gorges of
mountains." There are very few ancient remains
except a fine tank,two mules west of the
village,called Mathokar Tal on the bank of which
there is a dargah,said to be the tomb of one
Mathokar Khan. But as the site is said to have
been originally occupied by a temple of Kali,
and as the tank is still called Kali Mathokar,
the name is probably only a contraction of Math
Pokhar, or the temple tank, the full name having
been Kali Math Pokhar temple-tank, i.e, the tank
of the temple of Kali*.
अरियरी (शेखपुरा) प्रकृति की मनोरम गोद में अवस्थित शेखपुरा जिला का मटोखर दह (तालाब) एक पर्यटक स्थल होने की सारी अहर्ता रखने के बावजूद इस श्रेणी में शुमार होने की बाट जोह रहा है। टाटी नदी का किनारा और पहाड़ी इस क्षेत्र के अनुपम रूप में चार चांद लगा रही है। वैसे तो शेखपुरा के ईद-गिर्द अनेक मनमोहक स्थल है लेकिन पवित्रता एवं रमणीयता के कारण मटोखर दह एक अलग स्थान रखता है। इन दिनों मत्स्य विभाग इस तालाब को मछली उत्पादन के लिए कई खंडों में विभक्त कर रहा है, जो इस तालाब की विशालता व सौन्दर्य को कम कर रहा है। मटोखर दह तालाब शेखपुरा जिला मुख्यालय से लगभग 7 किलोमीटर पश्चिम एवं शेखोपुरसराय प्रखंड से लगभग 9 किलोमीटर दूरी पर अवस्थित है। यहां जाने के लिए शेखपुरा से जीप, टमटम, रिक्शा आदि साधन मुहैया हैं। यह तालाब मटोखर नामक गांव के समीप है। इसलिए इसे मटोखर दह कहते है। इस दह के दक्षिण देवरा एवं पथरैटा तथा पश्चिम में लोदीपुर व ढेवसा सरीखे प्राचीन गांव बसे है। मटोखर दह का क्षेत्रफल एक किलोमीटर लम्बा एवं आधा किलोमीटर चौड़ा है। कालांतर में इसकी गहराई में कमी आयी है। पहले इसकी गहराई को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते थे। लोग एक छोर से दूसरे छोर तक जाने की शर्त लगाते थे, तैराकी की प्रतियोगिताएं होती थीं। इस तालाब को आर-पार करना कठिन माना जाता था। इस दह (तालाब) में कभी भी पानी नहीं सूखता था। सर्दी एवं गर्मी में अनेक प्रकार के प्रवासी पक्षी जल विहार करने आते थे। इस दह में कमल एवं कमलिनी का जाल बिछा था, जो इसकी शोभा बढ़ाते थे। कमल के पत्तों का इस्तेमाल आसपास के गांवों में होने वाले भोज में पत्तल के रूप में किया जाता था। मटोखर गांव के लोगों एवं वहां के किसानों के लिए यह तालाब जीविका का साधन भी है। कृषि कार्य के लिए पूरे क्षेत्र में यह सिंचाई का एक मात्र साधन है। इस दह की रेहू मछली प्रसिद्ध है। इसलिए मत्स्य विभाग इस तालाब का तीन सालाना ठेका देता है। इतना ही नहीं मत्स्य विभाग ने दह (तालाब) को टुकड़ों व विभाजित कर दिया है जिससे इसकी विशालता व सौदर्य में कमी होनी शुरू हो गयी है। यह मटोखर दह हिन्दू-मुस्लिम आस्था का केन्द्र भी है। आज भी लोग यहां पिकनिक मनाने आते है। इस तालाब के निर्माण के संबंध में तरह-तरह की किदंतियां प्रचारित है। कुछ लोग इसे द्वापर काल में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भ्राता बलराम के आदेश पर ग्वाल बालों द्वारा खुदवाया मानते है। कुछ लोग इसे महाबली भीम द्वारा खुदवाया बताते है। कई इसे एक राजा द्वारा दही बेचने वाले के आग्रह पर खुदवाया गया बताते है। 'ख्वाजा बदरूद्दीन' नामक फकीर के कहने पर तालाब निर्माण की बात मानने वालों की भी कमी नहीं। प्रमाण के तौर पर तालाब किनारे अवस्थित दरगाह है जो मुस्लिमों एवं हिन्दुओं की आस्था का केन्द्र है। जानकारों का कहना है कि तालाब के उत्तर और दक्षिण की ओर टीले है, जो इसके वास्तु के लिहाज से द्वापरयुगीन होने की पुष्टि करते हैं। पूर्व में शेखपुरा के रह चुके जिलाधिकारी आनंद किशोर ने इसके सौंदर्यीकरण का प्रयास किया, जो अधूरा ही रह गया। वर्तमान में पर्यटन विभाग द्वारा सौंदर्यीकरण के प्रयास किये जा रहे है। बहरहाल जिला प्रशासन ने इस रमणीक स्थल के आस-पास के इलाके को पालिटेकनिक कालेज व केन्द्रीय विद्यालय खोले जाने के लिए चिह्नित किया है। फरीद खां, शेखपुरा में कैसे शेरशाह कहलाये (सौजन्य दैनिक जागरण 22 मार्च 2010 )
फरीद खां, शेखपुरा में शेरशाह कहलाये। 31 जुलाई 1994
को जिला बना शेखपुरा मगध एवं अंग संस्कृति का संधिस्थल
है। इस पवित्र धरती का संबंध महाभारत काल, पालवंश तथा
मुस्लिम शासकों से जुड़ा है। लोकगाथाओं में वर्णित है-गिरीहिंडा
पहाड़ पर हुंडा नामक दानवी से महापराक्रमी भीम ने
गंधर्व विवाह किया। उनके पुत्र हुंडारक हुए। कहा जाता
है कि गौतम बुद्ध ने शेखपुरा के श्यामा पोखर पर रात्रि
विश्राम किया था तथा मटोखर दहपर शिष्यों को उपदेश दिया
था। पाल वंश के शासनकाल में शेखपुरा मुख्य प्रशासनिक
केन्द्र था। मटोखर दह तथा पचना गांव में सरोवर तथा पचना
पहाड़ पर खंडहर व पवनचक्की के अंश अभी भी विद्यमान है।
मुस्लिम शासनकाल में शेखपुरा को कोतवाली का दर्जा मिला।
बुजुर्गो के मुताबिक फरीद खान युवा काल में शिकार
करते-करते शेखपुरा से 8 किलोमीटर पश्चिम उत्तर एक गांव
में पहुंचे। रात्रि विश्राम किया। फरीदपुर आज भी है।
यहीं शेर का शिकार करने के बाद उनका नाम शेरशाह पड़ा।
धारणा है कि उन्होंने ही शहर के खांडपर पहाड़ को
कटवाकर मार्ग बनवाया तथा पहाड़ से दक्षिण कुआं खुदवाया
था, जो आज दाल कुआं कहलाता है। इलाके का इतिहास अली
इब्राहिम खान से लेकर अंतिम नवाब बाकर अली खान से जुड़ा
है। कहते हैं-नवाब अली खान ने ठंड से परेशान सियारों
में भी कम्बल बांटने का निर्देश दिया था। ब्रिटिश काल
में शेखपुरा ने खान अब्दुल गफ्फार खान, डा.राजेन्द्र
प्रसाद, स्वामी सहजानंद सरस्वती, रामधारी सिंह दिनकर,
विनोबा भावे, डा.श्रीकृष्ण सिंह जैसे मनीषियों को अपनी
ओर आकर्षित किया।
» Geographical Profile
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